सोमवार, अगस्त 13, 2018
गुरुवार, जून 21, 2018
, आत्मीय संवेदना 2 january 2018
आत्मीय संवेदना
तुम आस थे
विश्वास थे
प्रणय सूत्र के
सूत्राधार
तुम इस तरह
विलीन हो गए
न जाने कहाँ
चले गए
बिखर गये जीवन के साज
टूट गई कल्पना की लड़ी।
नींद ढल गई
साथी तुम
बिछुड़ गए
ह्रदय में दर्द भरे
स्पन्दन का आभास
मस्तिष्क में
बेचैन यादों के शावक
छलागें मारने लगे
पीड़ाओं के कोहरे के बीच
प्रेम मिलन की
किरणें बिखर गईं
रह गई सर्द भरी यादें
तुम्हें महसूस करती
तुम्हारी यादों में
हर आहट में।
क्रिया कलापों में
बच्चों के प्रतिरूप में
जो छोड़ गए
पूरा करने की चाह में।
तुम्हारी यादों के सहारे
आरम्भ नया अध्याय
तुम्हें समर्पित मेरे
भावों के श्रद्धा सुमन
मन के उद्गार
तुम बन गए
मेरी यादों के सूत्राधार।
;
मंगलवार, सितंबर 26, 2017
महाकवि तुलसीदास जी को समर्पित
महाकवि तुलसीदास जी को समर्पित
कैसे तेरा गुणगान करूं
तुम अद्वितीय हो
अनन्त हो शाश्वत हो
अपने आराध्य देव का
नाम लिए जन्मे हो।
तुम तो आये धरा पर
राम नाम चरितार्थ करने।
केवल राम नाम में
लिख डाला महाकाव्य
समझा दिया मानव को
मानवता का पाठ
दिखा गए विश्व को
मुक्ति का द्वार
हे महान आत्मा
तुम अमरत्व को
हो गये प्राप्त
तुम्हारे रामचरित्र मानस में
सूर के सूरसागर में
अथाह ज्ञान का भंडार
तुम चरितार्थ कर गये
त्रेता व द्वापर युग को
मैं उलझ गई।
कैसे समझाऊं बच्चों को
तुलसी की रामायण
सूर का सूरसागर
सब यंत्र चलित
हो गये कलयुग में
सब भाग रहे
एक दूसरे की होड़ में
धन वैभव का जोश
राम नाम का न होश
कैसे करुं तुम्हारा मान।
अन्दर से क्षुब्ध हूँ व्यथित हूँ
कैसे करूँ गुणगान।
बच्चे राह भटक रहे
चकाचौंध में उलझ रहे
कैसे इनको समझाऊं
कोई ध्येय इन्हें बताऊ.
बीज शाश्वत का जो बो गए
इनके अन्दर पनपाऊं
हे महान आत्मा
तब समझ परिपूर्ण
मान तुम्हारा
हे तुलसी शत -शत बार नमन हमारा
सोमवार, अक्टूबर 03, 2016
समय की पुकार
उड़ी आतंकी हमले में शहीद जवानों को मेरा कोटि- कोटि प्रणाम भारत की सेना ने इस आतंक का जो मुहँ तोड़ जवाब दिया उनका में हार्दिक अभिनन्दन करती हूँ.
समय की पुकार
दुश्मन किसी समय
किसी भी पल
किसी भी छण
कर सकता प्रहार
समय की पुकार
संकल्प करो ,दृढ़ संकल्प
जान जाए पर आन न जाए
बन जाओ
सन सत्तावन की तलवार
दुश्मन कभी भी
कर सकता प्रहार
समय की पुकार .
बाहुबल 'बुद्धिबल
आत्मबल संजो लो
मत होने दो.
मानवता पर
दानवता का प्रहार
दुश्मन कभी भी
कर सकता वार
समय की पुकार
वीणा के तारों में भर दो
रण दुंदभि की झंकार
सीमाओं पर फैला दो
भय का कोहरा
बन जाओ फौलादी दीवार
समय की पुकार
जागो बन जाओ रणचंडी
पहन मुंड की माल
हा -हा कार मचा दो
सरहद के उस पार
दुश्मन कभी भी
कर सकता प्रहार
समय की पुकार .
उपरोक्त कविता युवाऔं के लिये है
शुक्रवार, अगस्त 14, 2015
स्वतंत्र देश में सब हो भयमुक्त
सभी दोस्तों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई
स्वतंत्र देश में
सब भय मुक्त हों
प्रेम का अंकुरण हो
अवसाद का नाम
न हो
कर्म की सरिता बहे
अंतर्मन विकसित हो
नव सर्जन की क्रांति हो
व्याभिचार का नाम न हो
नारी का उत्थान हो
सुशासन की राजनीति हो
सर्व पंथ समभाव हो
फ़िर से
राम राज्य का आगमन हो
मेरा देश ऐसा हो
स्वतंत्र देश में
सब भय मुक्त हों
प्रेम का अंकुरण हो
अवसाद का नाम
न हो
कर्म की सरिता बहे
अंतर्मन विकसित हो
नव सर्जन की क्रांति हो
व्याभिचार का नाम न हो
नारी का उत्थान हो
सुशासन की राजनीति हो
सर्व पंथ समभाव हो
फ़िर से
राम राज्य का आगमन हो
मेरा देश ऐसा हो
गुरुवार, जुलाई 30, 2015
हे महामानव अब्दुल कलाम
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम एक महान वैज्ञानिक,एक मिसाइल मैन, एक कवि ,एक शिक्षक ,एक संगीत प्रेमी ,एक महान व्यक्तित्व न जाने क्या -क्या रंग अपने मेँ समेटे हुऐ थे. जिन्होंने जीवन भर काम ही काम किया और काम करते -करते चले गए हमने एक महान व्यक्तित्व को खो दिया ऐसी महान आत्मा को मैं अपने भावों के श्रद्धा सुमन अर्पित करती हुए कोटि -कोटि बार प्रणाम करती हूँ.
भारत के इस महामानव को
शत -शत बार प्रणाम
तुम इस धरा पर
कई रंगो में विद्यमान
तन मन धन सब अर्पित कर
राष्ट्र को दे गए प्राण
बच्चों में नूतन स्वर भर
ज्ञान की धारा
धरा से चली गई
तुम जाते -जाते दे गए संदेश
तुम्हारा हर शेष
बन गया विशेष
तुम निरंतर चलते रहे
राष्ट्र की चेतना बन गए
तुम दृढ़ता वात्सल्य
भावनाओं से भरे हुए
प्रतीक बन कर रह गए
बोलते -बोलते स्वर लुप्त हो गए
वाणी का प्रवाह थम गया
तुम मौन हुए चले गए
प्रेरणा बन कर रह गए
हे महान आत्मा
तुम सृष्टि श्रेष्ठ बन गए.
नव वर्ष मुबारक
नव वर्ष मुबारक
( सभी लोगों को नव वर्ष मुबारक हो मंगलमय हो
हृदय के उपवन
विकसित हो मन
हो मधुर प्रभात
रंग गंध प्रेम स्नेह
फैले दिग दिगंत
नव बसंत हर
आंगन आए
ज्योति पुंज का
हो प्रकाश ,
स्वर्ण रश्मि की
आभा फैले ,
करें एक दूजे
का अभिनन्दन
वाणी में वीणा
की ध्वनि हो
जीवन हो मधुसार
आध्यात्मिकता
का हो प्रवाह
समग्र मानव जाति का हो उत्थान
( सभी लोगों को नव वर्ष मुबारक हो मंगलमय हो
हृदय के उपवन
विकसित हो मन
हो मधुर प्रभात
रंग गंध प्रेम स्नेह
फैले दिग दिगंत
नव बसंत हर
आंगन आए
ज्योति पुंज का
हो प्रकाश ,
स्वर्ण रश्मि की
आभा फैले ,
करें एक दूजे
का अभिनन्दन
वाणी में वीणा
की ध्वनि हो
जीवन हो मधुसार
आध्यात्मिकता
का हो प्रवाह
समग्र मानव जाति का हो उत्थान
सोमवार, जुलाई 27, 2015
मैं गंगा हूं...
मैं गंगा अनंत काल से
गंगोत्री ,गोमुख से निकल
हिम खण्डों चट्टानों से टकराकर
निर्मल निलाभ जल लेकरस्वच्छंद मनमौजी
बहती जाती ,बहती जाती
मेरे विशाल हृदय में
जलचर ,मत्स्य कुल
निर्भय करते विचरण
मैं कल -कल ,छल -छल
दुर्गम पथ राह बनाती
बहती जाती ,बहती जाती
मैं तन मन मस्त
पहाड़ों से अटखेलियां कर
हिमालय से सुंदरवन तक
विशाल भू -भाग को सींचती
हरियाली ही हरियाली लाती
जीवन का संगीत सुनाती
बहती जाती ,बहती जाती
मैं हिमालय वाहिनी गंगा
मुक्ति दाता ,पाप हरता
तुम्हारी भावनात्मक आस्था
समझ न सकी
हर हर गंगे ,हर हर गंगे
प्रतिध्वनि मेरे तट पर होती
मैं समझ न पाती
प्रतिक्षण -प्रतिपल सुनते ,सुनते
बहती जाती ,बहती जाती
देश -विदेश सात समुद्र पार
समेट पात्र मुझको ले जाते
बूंद -बूंद तर्पण अर्पण कर
जन्म मृत्यु तक साथ निभाती
मैं बहती जाती ,बहती जाती
मुझमे ही तुम स्वच्छ होते
मुझ में ही धोते पाप
कूड़ा करकट नाले
बड़ी मिलों का गंदा पानी
मुझे समर्पित करते
तुम स्वच्छ हो ,मुझे अस्वच्छ करते
मेरे उर की पीड़ा बढ़ जाती
पथ -पथिक ,राह राहगीर
अंजलि भर -भर प्यास बुझाती
स्वार्थ भरे जीवन से
निस्वार्थ प्रेम करो मुझसे
मेरे उर की पीड़ा समझो
मेरे तन को साफ करो
मैं प्रेरणास्रोत बन
आकुल व्याकुल ,
बहती जाती -बहती जाती
समय सागर से मिलने को आया
मैं मिलन का उन्माद लिए
आतुर सागर से मिलने को व्याकुल
बहती जाती ,बहती जाती
सागर को देख निकट
मेरे मन की व्यथा विकट
मेरे उर का संगीत मचल
आंचल में हल चल
मैं उत्तेजित जल धारा
आतुर व्याकुल सागर में मिल जाती
मैं सागर की हो कर ,सागर बन जाती.
शनिवार, जून 13, 2015
लघु विचार
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी वर्तमान भारत के प्रबल ,सशक्त इच्छाशक्ति वाले ,मजबूत ,दृढ़ विचार धारा को लेकर चलने वाले प्रधानमंत्री है। मोदी जी स्वामी विवेकानंद जी के अनुयायी है जिस प्रकार स्वामी जी ने विदेशों में जाकर भारतीय आध्यात्मिकता और तत्व ज्ञान की अद्भुत भारत की आध्यात्यिमक उपलब्धियों पर बोलते समय स्वामी जी प्रखर वक्ता बन जाते थे . उसी प्रकार मोदी जी ने भी विदेशो में जाकर बताया कि हम गरीब देश है पर पीछे नही तथा सर्व पंथ समभाव को प्रस्तुत किया.
स्वामी जी का सम्बोधन भाइयों और बहनों था। शिकागो महाधर्म सभा में उन्होंने अपना भाषण अमरीकी भाइयों बहिनों से आरंभ किया मोदी जी भी इसी सम्बोधन का प्रयोग करते है।
स्वामी जी धारा प्रवाह तरह बोलते है मोदी जी भी बोलते है तो रूकते नही। स्वामी जी ने भारत को आध्यात्म में विश्व गुरु बना कर विश्व के सामने खड़ा कर दिया ,मोदी जी ने इस का अनुसरण कर भारत को अपनी एक पहचान दिलाने और विकास की और ले जाने का प्रयत्न जारी रखा है.
स्वामी जी युवाओं से कहते थे संंघर्ष करते रहो ,अविराम संघर्ष करते रहो ,स्वयं को प्रेम ,वफादारी और धैर्य सम्पन्न बनाये रखो। आत्मविश्वास को दृढ़ रखो भारत से प्रेम करो।
मोदी जी भी युवाओं को नव जागरण के लिए प्रोत्साहित करते हैं, कहते हैं कि नव सर्जन की क्रान्ति युवा ही ला सकते हैं ,ब्रांड इन्डिया की ओर बल दो। इस समय राष्ट्र को आत्मविश्वासी प्रधानमंत्री मिले है अत:हमें राष्ट्र व्यापी भावनाओं को लेकर मोदी जी का साथ दे न चाहिए ताकि देश विकास की चरम सीमा को छू लें.
मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले अपने भाषण में इंद्रधनुष के सात रंग जो भारत को चमकाते हैं उन सात रंगों की जो व्याख्या की थी आशा है रंगोंकी कीर्ति बढ़ेगीे और देश खुशहाल होगा.
मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले अपने भाषण में इंद्रधनुष के सात रंग जो भारत को चमकाते हैं उन सात रंगों की जो व्याख्या की थी आशा है रंगोंकी कीर्ति बढ़ेगीे और देश खुशहाल होगा.
शुक्रवार, जून 05, 2015
प्रदूषण का महाकाल
हम लोग भूल चुके हैं कि हम पूर्णतयाः पृथ्वी
पर निर्भर है न कि पृथ्वी हम पर. मनुष्य ने विकास
की अंधाधुंध दौड़ में पर्यावरण को इस तरह घायल कर दिया है कि हमारे सामने प्रश्न बन
कर खड़ा हो गया है और हमें पर्यावरण दिवस मनाना पड़ रहा है.
प्रदूषण के महाकाल ने
फैलाया ऐसा जाल
नीला आकाश
मलिन हो गया
स्वच्छ हवा
दुर्गंध युक्तहो गई '
निर्मल जल
अस्वच्छ हो गया
प्रदूषण का महाकाल
निगल रहा धीरे -धीरे
हम भ्रमित हो रहें हैं
औद्योगिकरण,न्यूकिलयर ऊर्जा
प्रगति ,विकास की
चरम सीमा पाने में
भूल रहे.
प्रदूषण का महाकाल
डस रहा धीरे -धीरे
अंर्तमन जहर उसका फैल रहा
बच्चे निर्बल
जवान कमजोर
बूढ़े दमे से
हर कोई फँसा
महाकाल के जाल में।
आओं हम सब मिल कर
सोचे उपाय निवारण का
ताकि मिले ;
नीला आकाश ,सुगंधित हवा
मधुर समीर ,निर्मल जल
कामना करें
स्वस्थ मस्तिष्क ,स्वस्थ समाज
दूर करें
प्रदूषण के महाकाल
को,महाकाल को ...
मंगलवार, मई 26, 2015
एक विचार
आज भारत को विकास की जरूरत है। वर्तमान व भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन करना है तो उन्हें समझाना होगा ,उनकी चिंतन शक्ति ,आत्मबल ,राष्ट्र प्रेम को बढ़ाना होगा। आज हमारे प्रधानमंत्री भाई नरेन्द्र मोदी जी विकास के लिए विदेशों में जाकर भारत माता को फिर से स्वर्ण की प्रतिमा में बदलने की कोशिश कर रहे हें। तब हमारे देश के कुछ नेता धर्म के नाम पर विवादित भाषण देकर आपस में मतभेद पैदा कर रहें है।
विकास में रुकावट डाल रहे
है। कमी धर्म की नहीं है कमी शिक्षा की है। इतना समय बेकार की बातों में लगाने से
तो दूर दराज गावों -स्लम एरिया में जाकर उनको पढ़ाए हम तो ऐसे देश की संतान है जहाँ
आध्यात्मिकता का प्रवाह बहा ,पहले
तत्व ज्ञान ने अपनी विकास भूमि बनाई ,जहाँ पर संसार के सर्वश्रेष्ठ ऋषियों की चरण रज पड़ चुकीं यहीं पर
धर्म और दर्शन के आदर्शो ने अपनी चरम उन्नति प्राप्त की थी यह वही भूमि है जिसने
शताब्दियों से विदेशियों के आक्रमण ,सैकड़ों कष्ट सहकर भी अक्षय बना हुआ है जहाँ पर जीवन पर्वत की तरह
दृढ़ भाव से खड़ा है जहाँ पर विवेकानंद जैसे वीर संन्यासी ने जन्म लिया जिन्होंने
तीन दिवस तक इस देश के अंतिम छोर कन्याकुमारी में समुद्र के बीच शिलाखंड में बैठकर
भारत माता का चिंतन किया स्वामी जी भारत से प्रेम करते थे क्योंकि भारत भूमि
धर्मभूमि ,कर्मभूमि
,और यज्ञ
भूमि है संन्यासी बनना है तो स्वामी विवेकानंद की तरह बनो धर्म को लेकर राष्ट्र
विरोधी बातें कर युवाओं को मत भटकाओ उन्हें अपनी मातृभूमि के प्रति प्यार प्रेम और
जीवन समर्पित करने की प्रेरणा देनी चाहिए.
सोमवार, मार्च 16, 2015
धर्म, आस्था और नियम
आज की राजनिति आज के परिवेश में मुझे लगता है तीन शब्दों के अर्थ
अपनी राह से भटक गए हैं हर बात बिना सोचे समझे धर्म से जोड दी जाती है। धर्म तो
मानवता को जोड़ता है ,प्रेम और स्नेह पैदा करता है ,दया और उदारता ,अनुराग पैदा करता है। धर्म किसी भी
सम्प्रदाय का गलत नहीं होता है नहीं गलत सीख देता है धर्म मानव से काफी ऊंचा है.
स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार धर्म का अर्थ
न तो शब्द होता है न काम और न सम्प्रदाय इसका अर्थ होता है आध्यात्मिक अनुभूति
हमारा धर्म हमारी पवित्र परम्पराओं का एक सामान्य दृष्टिकोण है। जब तक धर्म कुछ इन
गिने पंडो पादरियों के हाथों में रहा तब तक इसका दायरा ,मंदिर गिरजाघर ,धर्मग्रंथों ,धार्मिक नियमों अनुष्ठानों और
बाह्यचारों तक सीमित रहा पर जब हम यथार्थ आध्यात्मिक और विश्वव्यापक धारणा पर होंगे
तब और तभी धर्म यथार्थ हो उठेगा हमारे जीवन का अंग बन जाएगा ,हमारी हर गति में रहेगा ,समाज के रोम -रोम में समा जायेगा और तब
इसकी शिवात्मक शक्ति पहले से अनन्त गुनी अधिक हो जायेगी। भारत ही एक मात्र ऐसा देश
है जिसके जीवन का आधार धर्म है हमारा उत्थान भी हुआ तो अध्यात्म मार्ग से और पतन
भी होगा तो आध्यात्म त्याग से हर धर्म चाहे वो हिन्दु हो सिख हो मुसलमान ,ईसाई हो मानवता को जोड़ता है शांति और
अमन का पाठ सिखाता है जिसके मन में सर्व भूताय सुखिन वाली भावना हो वही धर्म और
आस्था को सही समझ सकता है लोकतंत्र में सबको अपने अपने धर्म को स्वतंत्र रूप से
मानने का अधिकार है। हिंदुस्तान में रहने वाला व्यक्ति चाहे वो किसी भी जाति व
धर्म का हो सबसे पहले वह हिंदुस्तानी है भारतीय है धर्म और नियम दो अलग -अलग पहलू
है प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म को मानने में स्वतंत्र है पर व्यक्ति के लिए सरकार
जो नियम बनाती वो प्रत्येक समुदाय जाति के लिए समान होने चाहिये।
सब धर्म एक ही`चिरंतन धर्म के अभिन्न अंग है इनका मूल
तत्व एक ही है सभी मत और पठ पथ अच्छे होते हैं उनमे दोष ढूढ़ने के बजाय आपस में सामंजस्य लेने की कोशिश करे
ईश्वर जिनके अलग-अलग नाम है एक है सभी धर्मों के शास्त्र भगवान के पवित्र नामों का
गुण गान करते हैं भगवान के स्वभाव का स्पष्ट ज्ञान दिलाते हैं.
भारतीय विचार धारा ने सम्पूर्ण जगत को आध्यात्मिक और दार्शनिक ज्ञान
दिया यहाँ पर`आध्यात्मिक आत्मान्वेषण का विकास हुआ
ऐसी भारतभूमि पर हमारी विचार धारा कहाँ भटक गई कुछ लोग धर्म के नाम पर बबाल खड़ा कर
देते हैं जिससे राष्ट्र के विकास में बाधा उतपन्न हो जाती है.
अतः हमें शांति सामंजस्य और सत्य को अपनाते हुए कर्म करने चाहिए।
सोमवार, मार्च 02, 2015
प्रेम सुधारस बरसा दो
आप सभी लोगों को होली की मुबारक होली मंगलमय शुभ ,प्रगतिमय हो
होली की पावन बेला
में
रंग होली खूब मनाओ
एक दूजे के रंग में रंग जाओ
प्रेम भाव मधुरस बरसाओ।
आज डुबो दो मन का प्याला
भर लो गागर प्यार की
स्नेह सुधा रस बरसा दो
कर दो रंगों की फुहार।
रंग बसन्ती ,मन बसन्ती
उड़ाओ अबीर गुलाल
सतरंगी रंगों से भर लो
मन की गागर
छलका दो अनुराग
नारी का पत
पुरुष की पाग
एक दूजे के रंग में
रंग में रंग दो
हृदय से हृदय के
तारों को जोड़ो.
वाणी को वीणा से कर दो
झंकार
होली की इस पवन बेला
में
प्रेम सुधारस बरसा दो
तरु -तरु में पल्लव
आते
लता-लता कुसमित होती
धरा सुनहरी लगती
फागुन
नव यौवन ऐसे बरसे
जैसे मधुर फाग।
अवनि अंबर सब
मधुमय करदो
प्रेम सुधारस बरसाओ
होली की पावन बेला
में
रंग होली खूब मनाओ
ढोल बाजे ,मजीरा बाजे
बाजे शहनाई।
नर -नारी सब होली
खेले
बाजे मधुर मृदंग
मन से मन का मिलन हो
जीवन से जीवन जुड़ जाए
वाणी से सुर निकले वीणा के
ऐसे फागुन में फाग बरसे
हो जाए सब मधुलीन
उषा काल की सुनहरी विभा
संध्या की नभ लालिमा
पूणिमा की चाँदनी में
करो प्रगट मन के उद्गार
पिया मिलन की आस में
प्रेम सुमन रस बरसाओ
आज डुबो दो मन का प्याला
भर लो गागर प्यार की
जीवन के कण -कण को
मधुरस से मधुमय करदो
प्रेम सुधारस बरसा दो
होली की पावन बेला में
रंग होली खूब मनाओ.
आप सभी लोगों को होली की मुबारक होली मंगलमय शुभ ,प्रगतिमय हो
होली की पावन बेला
में
रंग होली खूब मनाओ
एक दूजे के रंग में रंग जाओ
प्रेम भाव मधुरस बरसाओ।
आज डुबो दो मन का प्याला
भर लो गागर प्यार की
स्नेह सुधा रस बरसा दो
कर दो रंगों की फुहार।
रंग बसन्ती ,मन बसन्ती
उड़ाओ अबीर गुलाल
सतरंगी रंगों से भर लो
मन की गागर
छलका दो अनुराग
नारी का पत
पुरुष की पाग
एक दूजे के रंग में
रंग में रंग दो
हृदय से हृदय के
तारों को जोड़ो.
वाणी को वीणा से कर दो
झंकार
होली की इस पवन बेला
में
प्रेम सुधारस बरसा दो
तरु -तरु में पल्लव
आते
लता-लता कुसमित होती
धरा सुनहरी लगती
फागुन
नव यौवन ऐसे बरसे
जैसे मधुर फाग।
अवनि अंबर सब
मधुमय करदो
प्रेम सुधारस बरसाओ
होली की पावन बेला
में
रंग होली खूब मनाओ
ढोल बाजे ,मजीरा बाजे
बाजे शहनाई।
नर -नारी सब होली
खेले
बाजे मधुर मृदंग
मन से मन का मिलन हो
जीवन से जीवन जुड़ जाए
वाणी से सुर निकले वीणा के
ऐसे फागुन में फाग बरसे
हो जाए सब मधुलीन
उषा काल की सुनहरी विभा
संध्या की नभ लालिमा
पूणिमा की चाँदनी में
करो प्रगट मन के उद्गार
पिया मिलन की आस में
प्रेम सुमन रस बरसाओ
आज डुबो दो मन का प्याला
भर लो गागर प्यार की
जीवन के कण -कण को
मधुरस से मधुमय करदो
प्रेम सुधारस बरसा दो
होली की पावन बेला में
रंग होली खूब मनाओ.
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