कान्हा कन्हैया
माधव मुरारी
कौन कुंज गलिन
कहाँ हो बिहारी
सृष्टि निर्माता
उत्तम रचना मानव
सृष्टि की बनाकर
कहां छिपे हो बिहारी
आ भी जाओ
प्रेम सुधा रस बरसा दो
स्नेह प्यार फैला दो
गीता का ज्ञान
दिया तुमने
अब तो ज्ञान और नाम
बिक रहा गली- गली
फिर भी मानव
मानव का प्यासा
न दया न दर्द
संवेदना करुणा विहीन
हो गये प्राणी
एक बार आकर
प्रेम सुधा रस बरसा दो
स्नेह प्यार फैला दो
निश्छल प्रेम
समर्पित समर्पण
भाव भर दो
जन - जन के मन में
ओ राधा के मीत
सुना दो बाँसुरी के गीत
मन की व्यथा हर लो
सुर संगीत से
प्रेम सुधा रस बरसा दो
स्नेह प्यार फैला दो
ह्रदय क़ुरुक्षेत्र
भावना करुणा विहीन
भय आतंक का परिवेश
तनिक निहारो
अपनी वसुंधरा को
बांसुरी के गीत से
सब को मीत बना लो
मधुर गीत सुना दो
प्रेम सुधा रस बरसा दो
स्नेह प्यार फैला दो
स्नेह प्यार फैला दो...