सोमवार, मार्च 16, 2015

धर्म, आस्था और नियम

                                                   
 आज की राजनिति आज के परिवेश में मुझे लगता है तीन शब्दों के अर्थ अपनी राह से भटक गए हैं हर बात बिना सोचे समझे धर्म से जोड दी जाती है। धर्म तो मानवता को जोड़ता है ,प्रेम और स्नेह पैदा करता है ,दया और उदारता ,अनुराग पैदा करता है। धर्म किसी भी सम्प्रदाय का गलत नहीं होता है नहीं गलत सीख देता है धर्म मानव से काफी ऊंचा है.          
 स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार धर्म का अर्थ न तो शब्द होता है न काम और न सम्प्रदाय इसका अर्थ होता है आध्यात्मिक अनुभूति हमारा धर्म हमारी पवित्र परम्पराओं का एक सामान्य दृष्टिकोण है। जब तक धर्म कुछ इन गिने पंडो पादरियों के हाथों में रहा तब तक इसका दायरा ,मंदिर गिरजाघर ,धर्मग्रंथों ,धार्मिक नियमों अनुष्ठानों और बाह्यचारों तक सीमित रहा पर जब हम यथार्थ आध्यात्मिक और विश्वव्यापक धारणा पर होंगे तब और तभी धर्म यथार्थ हो उठेगा हमारे जीवन का अंग बन जाएगा ,हमारी हर गति में रहेगा ,समाज के रोम -रोम में समा जायेगा और तब इसकी शिवात्मक शक्ति पहले से अनन्त गुनी अधिक हो जायेगी। भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जिसके जीवन का आधार धर्म है हमारा उत्थान भी हुआ तो अध्यात्म मार्ग से और पतन भी होगा तो आध्यात्म त्याग से   र धर्म चाहे वो हिन्दु हो सिख हो मुसलमान ,ईसाई हो मानवता को जोड़ता है शांति और अमन का पाठ सिखाता है जिसके मन में सर्व भूताय सुखिन वाली भावना हो वही धर्म और आस्था को सही समझ सकता है लोकतंत्र में सबको अपने अपने धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने का अधिकार है। हिंदुस्तान में रहने वाला व्यक्ति चाहे वो किसी भी जाति व धर्म का हो सबसे पहले वह हिंदुस्तानी है भारतीय है धर्म और नियम दो अलग -अलग पहलू है प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म को मानने में स्वतंत्र है पर व्यक्ति के लिए सरकार जो नियम बनाती वो प्रत्येक समुदाय जाति के लिए समान होने चाहिये।
 सब धर्म एक ही`चिरंतन धर्म के अभिन्न अंग है इनका मूल तत्व एक ही है सभी मत और पठ पथ अच्छे होते   हैं उनमे दोष ढूढ़ने के बजाय आपस में सामंजस्य लेने की कोशिश करे ईश्वर जिनके अलग-अलग नाम है एक है सभी धर्मों के शास्त्र भगवान के पवित्र नामों का गुण गान करते हैं भगवान के स्वभाव का स्पष्ट ज्ञान दिलाते हैं. 
 भारतीय विचार धारा ने सम्पूर्ण जगत को आध्यात्मिक और दार्शनिक ज्ञान दिया यहाँ पर`आध्यात्मिक आत्मान्वेषण का विकास हुआ ऐसी भारतभूमि पर हमारी विचार धारा कहाँ भटक गई कुछ लोग धर्म के नाम पर बबाल खड़ा कर देते हैं जिससे राष्ट्र के विकास में बाधा उतपन्न हो जाती है.
 अतः हमें शांति सामंजस्य और सत्य को अपनाते हुए कर्म  करने चाहिए।
               
                                                                   


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