बुधवार, अगस्त 20, 2014

नियति की पुकार

 ,

हम इस धरती के किरायेदार है न कि मालिक अंतः ;हमें इसका प्रयोग एक समझदार किरायेदार की तरह करना चाहिए अन्यथा इसके दु ष्परिणाम ही भुगतने होंगे '
अवनि से अम्बर तक ,बिखरते गये
  सागर से हिमालय तक ,फैलते गये
  विकास की चरम सीमा लाँघते गये
   धरती गरम होती गई ,
   ग्लेशियर ,हिमखण्ड ,पिघलते गये ,
प्रकृति की गोद में ,उधेड़बुन करते गये ,
 हर जगह आशियाना ,बनाते  गये
मेरे अस्तित्व को नकारा
   कई बार कराया आभास ,
   तुम न आये रास
    कई तांडव नृत्य दिखाये
  भूकम्प के क्रंदन का
  सुनामी की उद्धत लहरों  का 
 जल के असीम प्रवाह का।
आँधी तूफान का                 
मेरे क्रंदन को समझ न पाये। 
आक्रोश बढ़ाते चले गये
देखा तुमने ?
महाप्रलय जल का
शिलाखंडों का बहना
धर्म की आस्था का बहजाना
बहुत कुछ पाने की लालसा में
सब कुछ खोजना