मैं गंगा अनंत काल से
गंगोत्री ,गोमुख से निकल
हिम खण्डों चट्टानों से टकराकर
निर्मल निलाभ जल लेकरस्वच्छंद मनमौजी
बहती जाती ,बहती जाती
मेरे विशाल हृदय में
जलचर ,मत्स्य कुल
निर्भय करते विचरण
मैं कल -कल ,छल -छल
दुर्गम पथ राह बनाती
बहती जाती ,बहती जाती
मैं तन मन मस्त
पहाड़ों से अटखेलियां कर
हिमालय से सुंदरवन तक
विशाल भू -भाग को सींचती
हरियाली ही हरियाली लाती
जीवन का संगीत सुनाती
बहती जाती ,बहती जाती
मैं हिमालय वाहिनी गंगा
मुक्ति दाता ,पाप हरता
तुम्हारी भावनात्मक आस्था
समझ न सकी
हर हर गंगे ,हर हर गंगे
प्रतिध्वनि मेरे तट पर होती
मैं समझ न पाती
प्रतिक्षण -प्रतिपल सुनते ,सुनते
बहती जाती ,बहती जाती
देश -विदेश सात समुद्र पार
समेट पात्र मुझको ले जाते
बूंद -बूंद तर्पण अर्पण कर
जन्म मृत्यु तक साथ निभाती
मैं बहती जाती ,बहती जाती
मुझमे ही तुम स्वच्छ होते
मुझ में ही धोते पाप
कूड़ा करकट नाले
बड़ी मिलों का गंदा पानी
मुझे समर्पित करते
तुम स्वच्छ हो ,मुझे अस्वच्छ करते
मेरे उर की पीड़ा बढ़ जाती
पथ -पथिक ,राह राहगीर
अंजलि भर -भर प्यास बुझाती
स्वार्थ भरे जीवन से
निस्वार्थ प्रेम करो मुझसे
मेरे उर की पीड़ा समझो
मेरे तन को साफ करो
मैं प्रेरणास्रोत बन
आकुल व्याकुल ,
बहती जाती -बहती जाती
समय सागर से मिलने को आया
मैं मिलन का उन्माद लिए
आतुर सागर से मिलने को व्याकुल
बहती जाती ,बहती जाती
सागर को देख निकट
मेरे मन की व्यथा विकट
मेरे उर का संगीत मचल
आंचल में हल चल
मैं उत्तेजित जल धारा
आतुर व्याकुल सागर में मिल जाती
मैं सागर की हो कर ,सागर बन जाती.