हम लोग भूल चुके हैं कि हम पूर्णतयाः पृथ्वी
पर निर्भर है न कि पृथ्वी हम पर. मनुष्य ने विकास
की अंधाधुंध दौड़ में पर्यावरण को इस तरह घायल कर दिया है कि हमारे सामने प्रश्न बन
कर खड़ा हो गया है और हमें पर्यावरण दिवस मनाना पड़ रहा है.
प्रदूषण के महाकाल ने
फैलाया ऐसा जाल
नीला आकाश
मलिन हो गया
स्वच्छ हवा
दुर्गंध युक्तहो गई '
निर्मल जल
अस्वच्छ हो गया
प्रदूषण का महाकाल
निगल रहा धीरे -धीरे
हम भ्रमित हो रहें हैं
औद्योगिकरण,न्यूकिलयर ऊर्जा
प्रगति ,विकास की
चरम सीमा पाने में
भूल रहे.
प्रदूषण का महाकाल
डस रहा धीरे -धीरे
अंर्तमन जहर उसका फैल रहा
बच्चे निर्बल
जवान कमजोर
बूढ़े दमे से
हर कोई फँसा
महाकाल के जाल में।
आओं हम सब मिल कर
सोचे उपाय निवारण का
ताकि मिले ;
नीला आकाश ,सुगंधित हवा
मधुर समीर ,निर्मल जल
कामना करें
स्वस्थ मस्तिष्क ,स्वस्थ समाज
दूर करें
प्रदूषण के महाकाल
को,महाकाल को ...