नव वर्ष हर साल की तरह
इस बार भी फिर से
मेरे आँगन आया
बोला
मै फिर आ गया
तुम मेरे स्वागत में
ओत -प्रोत हो
झूम उठे मस्ती मे
मै
तुम्हे शताब्दियों से
छलता आ रहा
मै निकल जाता
तुम देखते रह जाते
क्योंकि
मैं
समय हूँ
मेरा
रूप महीनो
के
साथ
सालो
शताब्दियों में
परवर्तित
होता
मेरा ये क्रम
चलता
रहेगा
ये
नियति
का खेल
तुम
केवल पात्र हो
में
खिलता रहता
तुम
सोचते रहते
मै
निकल जाता
क्योंकि मैं समय हूँ
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