शनिवार, जून 13, 2015

लघु विचार

                                               

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी वर्तमान भारत  के प्रबल ,सशक्त इच्छाशक्ति वाले ,मजबूत ,दृढ़ विचार धारा को लेकर चलने वाले प्रधानमंत्री है। मोदी जी स्वामी विवेकानंद जी के अनुयायी है जिस प्रकार स्वामी जी ने विदेशों में जाकर भारतीय आध्यात्मिकता और तत्व ज्ञान की अद्भुत भारत  की आध्यात्यिमक उपलब्धियों  पर बोलते समय स्वामी जी  प्रखर वक्ता बन जाते थे . उसी प्रकार मोदी जी ने भी विदेशो में जाकर बताया कि हम गरीब देश  है पर पीछे नही तथा सर्व पंथ समभाव को प्रस्तुत किया.
                           स्वामी जी का सम्बोधन भाइयों और बहनों था। शिकागो महाधर्म सभा में उन्होंने अपना भाषण अमरीकी भाइयों बहिनों से आरंभ किया मोदी जी भी इसी सम्बोधन का प्रयोग करते है। 
                           स्वामी जी धारा प्रवाह तरह बोलते है मोदी जी भी बोलते है तो रूकते नही। स्वामी जी ने भारत को आध्यात्म में विश्व गुरु बना कर विश्व के सामने खड़ा कर दिया ,मोदी जी ने इस का अनुसरण कर भारत को अपनी एक पहचान दिलाने और विकास की और ले जाने का प्रयत्न जारी रखा है.
                         स्वामी जी युवाओं से  कहते थे संंघर्ष करते रहो ,अविराम संघर्ष करते रहो ,स्वयं को प्रेम ,वफादारी और धैर्य सम्पन्न बनाये रखो। आत्मविश्वास को दृढ़ रखो भारत से प्रेम करो। 
                        मोदी जी भी युवाओं को नव जागरण के लिए प्रोत्साहित करते हैं,  कहते हैं कि नव सर्जन की क्रान्ति युवा ही ला सकते हैं ,ब्रांड इन्डिया की ओर बल दो। इस समय राष्ट्र को आत्मविश्वासी प्रधानमंत्री मिले है अत:हमें राष्ट्र व्यापी भावनाओं को लेकर मोदी जी का साथ दे न चाहिए ताकि देश विकास की चरम सीमा को छू लें.
   मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले अपने भाषण में इंद्रधनुष के सात रंग जो भारत को चमकाते हैं उन सात रंगों की जो व्याख्या  की थी आशा है रंगोंकी कीर्ति बढ़ेगीे और देश खुशहाल होगा.

शुक्रवार, जून 05, 2015

प्रदूषण का महाकाल

 हम लोग भूल चुके हैं कि हम पूर्णतयाः पृथ्वी  पर निर्भर है न कि पृथ्वी हम पर. मनुष्य ने विकास की अंधाधुंध दौड़ में पर्यावरण को इस तरह घायल कर दिया है कि हमारे सामने प्रश्न बन कर खड़ा हो गया है और हमें पर्यावरण दिवस मनाना पड़ रहा है.
                                                                                        
                                           प्रदूषण के महाकाल ने          
                                           फैलाया ऐसा जाल
                                             नीला आकाश
                                             मलिन हो गया
                                            स्वच्छ हवा
                                             दुर्गंध युक्तहो गई '
                                              निर्मल जल
                                             अस्वच्छ हो गया
                                              प्रदूषण का महाकाल
                                             निगल रहा धीरे -धीरे
                                             हम भ्रमित हो रहें हैं
                                                औद्योगिकरण,न्यूकिलयर ऊर्जा
                                                प्रगति ,विकास की
                                                 चरम सीमा पाने में
                                                   भूल रहे.
                                                 प्रदूषण का महाकाल
                                                 डस रहा धीरे -धीरे                                     
                      अंर्तमन  जहर उसका फैल रहा
                                              बच्चे निर्बल
                                             जवान कमजोर
                                             बूढ़े दमे से
                                              हर कोई फँसा
                                          महाकाल के जाल में।
                                       आओं हम सब मिल कर
                                        सोचे उपाय निवारण का
                                       ताकि मिले ;
                                       नीला आकाश ,सुगंधित हवा
                                        मधुर समीर ,निर्मल जल
                                          कामना करें
                                 स्वस्थ मस्तिष्क ,स्वस्थ समाज
                                   दूर करें
                                   प्रदूषण के महाकाल को,महाकाल को ...
                                   
                                       

     




                                


मंगलवार, मई 26, 2015

एक विचार


आज भारत को विकास की जरूरत है। वर्तमान व भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन करना है तो उन्हें समझाना होगा ,उनकी चिंतन शक्ति ,आत्मबल ,राष्ट्र प्रेम को बढ़ाना होगा। आज हमारे प्रधानमंत्री भाई नरेन्द्र मोदी जी विकास के लिए विदेशों में जाकर भारत माता को फिर से स्वर्ण की प्रतिमा में बदलने की कोशिश कर रहे हें। तब हमारे देश के कुछ नेता धर्म के नाम पर विवादित भाषण देकर आपस में मतभेद पैदा कर रहें है।
विकास में रुकावट  डाल रहे है। कमी धर्म की नहीं है कमी शिक्षा की है। इतना समय बेकार की बातों में लगाने से तो दूर दराज गावों -स्लम एरिया में जाकर उनको पढ़ाए हम तो ऐसे देश की संतान है जहाँ आध्यात्मिकता का प्रवाह बहा ,पहले तत्व ज्ञान ने अपनी विकास भूमि बनाई ,जहाँ पर संसार के सर्वश्रेष्ठ ऋषियों की चरण रज पड़ चुकीं यहीं पर धर्म और दर्शन के आदर्शो ने अपनी चरम उन्नति प्राप्त की थी यह वही भूमि है जिसने शताब्दियों से विदेशियों के आक्रमण ,सैकड़ों कष्ट सहकर भी अक्षय बना हुआ है जहाँ पर जीवन पर्वत की तरह दृढ़ भाव से खड़ा है जहाँ पर विवेकानंद जैसे वीर संन्यासी ने जन्म लिया जिन्होंने तीन दिवस तक इस देश के अंतिम छोर कन्याकुमारी में समुद्र के बीच शिलाखंड में बैठकर भारत माता का चिंतन किया स्वामी जी भारत से प्रेम करते थे क्योंकि भारत भूमि धर्मभूमि ,कर्मभूमि ,और यज्ञ भूमि है संन्यासी बनना है तो स्वामी विवेकानंद की तरह बनो धर्म को लेकर राष्ट्र विरोधी बातें कर युवाओं को मत भटकाओ उन्हें अपनी मातृभूमि के प्रति प्यार प्रेम और जीवन समर्पित करने की प्रेरणा देनी चाहिए.


सोमवार, मार्च 16, 2015

धर्म, आस्था और नियम

                                                   
 आज की राजनिति आज के परिवेश में मुझे लगता है तीन शब्दों के अर्थ अपनी राह से भटक गए हैं हर बात बिना सोचे समझे धर्म से जोड दी जाती है। धर्म तो मानवता को जोड़ता है ,प्रेम और स्नेह पैदा करता है ,दया और उदारता ,अनुराग पैदा करता है। धर्म किसी भी सम्प्रदाय का गलत नहीं होता है नहीं गलत सीख देता है धर्म मानव से काफी ऊंचा है.          
 स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार धर्म का अर्थ न तो शब्द होता है न काम और न सम्प्रदाय इसका अर्थ होता है आध्यात्मिक अनुभूति हमारा धर्म हमारी पवित्र परम्पराओं का एक सामान्य दृष्टिकोण है। जब तक धर्म कुछ इन गिने पंडो पादरियों के हाथों में रहा तब तक इसका दायरा ,मंदिर गिरजाघर ,धर्मग्रंथों ,धार्मिक नियमों अनुष्ठानों और बाह्यचारों तक सीमित रहा पर जब हम यथार्थ आध्यात्मिक और विश्वव्यापक धारणा पर होंगे तब और तभी धर्म यथार्थ हो उठेगा हमारे जीवन का अंग बन जाएगा ,हमारी हर गति में रहेगा ,समाज के रोम -रोम में समा जायेगा और तब इसकी शिवात्मक शक्ति पहले से अनन्त गुनी अधिक हो जायेगी। भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जिसके जीवन का आधार धर्म है हमारा उत्थान भी हुआ तो अध्यात्म मार्ग से और पतन भी होगा तो आध्यात्म त्याग से   र धर्म चाहे वो हिन्दु हो सिख हो मुसलमान ,ईसाई हो मानवता को जोड़ता है शांति और अमन का पाठ सिखाता है जिसके मन में सर्व भूताय सुखिन वाली भावना हो वही धर्म और आस्था को सही समझ सकता है लोकतंत्र में सबको अपने अपने धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने का अधिकार है। हिंदुस्तान में रहने वाला व्यक्ति चाहे वो किसी भी जाति व धर्म का हो सबसे पहले वह हिंदुस्तानी है भारतीय है धर्म और नियम दो अलग -अलग पहलू है प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म को मानने में स्वतंत्र है पर व्यक्ति के लिए सरकार जो नियम बनाती वो प्रत्येक समुदाय जाति के लिए समान होने चाहिये।
 सब धर्म एक ही`चिरंतन धर्म के अभिन्न अंग है इनका मूल तत्व एक ही है सभी मत और पठ पथ अच्छे होते   हैं उनमे दोष ढूढ़ने के बजाय आपस में सामंजस्य लेने की कोशिश करे ईश्वर जिनके अलग-अलग नाम है एक है सभी धर्मों के शास्त्र भगवान के पवित्र नामों का गुण गान करते हैं भगवान के स्वभाव का स्पष्ट ज्ञान दिलाते हैं. 
 भारतीय विचार धारा ने सम्पूर्ण जगत को आध्यात्मिक और दार्शनिक ज्ञान दिया यहाँ पर`आध्यात्मिक आत्मान्वेषण का विकास हुआ ऐसी भारतभूमि पर हमारी विचार धारा कहाँ भटक गई कुछ लोग धर्म के नाम पर बबाल खड़ा कर देते हैं जिससे राष्ट्र के विकास में बाधा उतपन्न हो जाती है.
 अतः हमें शांति सामंजस्य और सत्य को अपनाते हुए कर्म  करने चाहिए।
               
                                                                   


सोमवार, मार्च 02, 2015

प्रेम सुधारस बरसा दो

                 आप सभी  लोगों को होली की मुबारक होली मंगलमय शुभ ,प्रगतिमय हो 
                                                              होली की पावन बेला में
                    रंग होली खूब मनाओ
                     एक दूजे के रंग में रंग जाओ 
                    प्रेम भाव मधुरस बरसाओ। 
                     आज डुबो दो मन का प्याला 
                    भर लो गागर प्यार की 
                    स्नेह सुधा रस बरसा दो 
                  कर दो रंगों की फुहार। 
                 रंग बसन्ती ,मन बसन्ती 
                उड़ाओ अबीर गुलाल 
                 सतरंगी रंगों से भर लो 
               मन की गागर 
                छलका दो अनुराग 
               नारी का पत 
              पुरुष की पाग 
              एक दूजे के रंग में रंग में रंग दो 
              हृदय से हृदय के तारों को जोड़ो.  
              वाणी को वीणा से कर दो झंकार 
              होली की इस पवन बेला में 
              प्रेम सुधारस बरसा दो 
              तरु -तरु में पल्लव आते 
                 लता-लता कुसमित होती 
                धरा सुनहरी लगती फागुन
               नव यौवन ऐसे बरसे
               जैसे मधुर फाग। 
               अवनि अंबर सब 
               मधुमय करदो 
                प्रेम सुधारस बरसाओ 
                होली की पावन बेला में 
               रंग होली खूब मनाओ 
            ढोल बाजे ,मजीरा बाजे 
               बाजे शहनाई। 
              नर -नारी सब होली खेले 
            बाजे मधुर मृदंग 
              मन से मन का मिलन हो 
             जीवन से जीवन जुड़ जाए 
           वाणी से सुर निकले वीणा के 
          ऐसे फागुन में फाग बरसे 
          हो जाए सब मधुलीन 
         उषा काल की सुनहरी विभा 
         संध्या की नभ लालिमा 
          पूणिमा की चाँदनी में 
       करो प्रगट मन के उद्गार 
       पिया मिलन की आस में
       प्रेम सुमन रस बरसाओ 
       आज डुबो दो मन का प्याला 
       भर लो गागर प्यार की 
      जीवन के कण -कण को 
     मधुरस से मधुमय करदो 
प्रेम सुधारस बरसा दो 
होली की पावन बेला में 
रंग होली खूब मनाओ.  
        
                          
          
                     
                                    

रविवार, फ़रवरी 15, 2015

व्यवस्था को बदलना होगा

दिल्ली में दस फ़रवरी दोहजार पंद्रह को जो जनादेश आप पार्टी को मिला। वो हिंदुस्तान की राजनीति में परिवर्तन और नव क्रांति का जनता का व्यवस्था को पैगाम है। आप पार्टी और मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल जी को जीत की मुबारक व शुभकामनांए। 
                                                   व्यवस्था को बदलना होगा
                                       आदमी को आदमी से 
                                       जोड़ना होगा 
                                        अमीरी गरीबी की 
                                        खाई कोपाटना होगा 
                                      व्यवस्था को बदलना होगा 
                                       घंटो आदर्शो का बखान 
                                       मोहल्लों गलियों 
                                       स्कूल ,विद्यालयों 
                                       दीवारों स्टेशनों पर 
                                      बड़े -बड़े शब्द ,आदर्श वाक्य 
                                       लिखकर अब 
                                        जनता को गुमराह 
                                       व्यवस्था को 
                                        ढका नहींजा  सकता
                                        अब व्यवस्था को बदलना होगा 
                                        मांगना नहीं होगा
                                       व्यवस्था को देना होगा 
                                     व्यक्ति का अधिकार 
                                      जीने का अधिकार 
                                      जो संसद में बैठे हे 
                                      पदों पर उन्हें 
                                     उतरना होगा 
                                   चलना होगा गली कूचे 
                                   साथ -साथ 
                                व्यवस्था को बदलना होगा 
                                असंख्य घोषणाएं 
                                   अस्वासनो का शब्दजाल 
                              घोषणाओं का कड़वा स्वाद 
                            पुरानी व्यवस्था को 
                            टूटना होगा 
                              यथार्थ में लौटना होगा 
                             आदमी -को आदमी से जोड़ना होगा 
                           व्यवस्था को बदलना होगा 
                        आरोप -प्रत्यारोप से 
                        हटना होगा 
                      सत्ता की चाह के लिए 
                       वादे नहीं 
                      अग्नि में तपना होगा                                       
                     व्यवस्था को बदलना होगा 
                      जो अपने पास हे 
                     उसे सहेजना होगा 
                     मूल जरूरतों को 
                    पूरा करना होगा 
                      रोटी ,पानी ,भुखमरी 
                      अमीरी गरीबी का
                  माप दंड बनाना होगा 
                   नव विकास ,नई उपलब्धियों 
                    के लिए 
                  युवावों को जोड़ना होगा 
                  व्यवस्था को बदलना होगा  
                                            
                                                             

गुरुवार, जनवरी 01, 2015

मैं समय हूँ

                                                                
                                       नव वर्ष हर साल की तरह
                                         इस बार भी फिर से
                                           मेरे आँगन आया
                                         बोला
                                             मै फिर आ गया
                                             तुम मेरे स्वागत में
                                             ओत -प्रोत हो
                                                 झूम उठे मस्ती मे
                                          मै 
                                                 तुम्हे शताब्दियों से
                                                 छलता आ रहा
                                                   मै निकल जाता
                                                  तुम देखते रह जाते
                                        क्योंकि
                                                     मैं समय हूँ
                                                     मेरा रूप महीनो
                                                      के साथ
                                                      सालो शताब्दियों में
                                                     परवर्तित होता
                                                    मेरा ये क्रम
                                                      चलता रहेगा
                                      ये
                                                     नियति का खेल
                                                        तुम केवल पात्र हो
                                                      में खिलता रहता
                                                      तुम सोचते रहते
                                                      मै निकल जाता
                                                 क्योंकि मैं समय हूँ
                                               
                                                              


                    

                                                   


मंगलवार, दिसंबर 30, 2014

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

                                                     मार्तंड [सूरज ]उदय हो
                                                     उषा का आगमन हो 
                                                       यामिनी जाती रहे 
                                                  पृथ्वी बसन्त मनाती रहे       
                                                      प्रति पल ,प्रति प्रहर ,
                                                     प्रति दिवस ,प्रति मास 
                                                          सुखद परिवर्तन हो 
                                                          प्रेम स्नेह ,प्यार 
                                                 पारिजात पुष्प समूह
                                                      से सुवासित हो 
                                                  अवसाद का नाम न हो
                                                आनन्द का उन्माद हो 
                                                       नव वर्ष ऐसा हो 
                           इन्ही भावनाओं के साथ आप सभी लोगों नव वर्ष मुबारक हो . 

                                                                


  

शनिवार, दिसंबर 06, 2014

शान्ती पैदा करो