सोमवार, सितंबर 01, 2014

विगत स्मृतियाँ

अपनी विगत स्मृतियों के द्वारा कुमाऊँ  के कुछ स्थानों  की प्राकृतिक सौंदर्यता को अवगत कराने की कोशिश। 

           एकांत के क्षण जब  मैंअकेली  होती हूँ चारों ओर का शोर शराबा अगल-बगल के घर की खट  _खट की आवाज भी मुझे नहीं सुनाई देती तब मैं और मेरा मन विगत स्मृतियों के साथ न जाने कहाँ _कहाँ भटकता रहता है और ये छण मेरे लिए सुखद व आनन्द से भरे होतेहैं  तब मुझे लगता है मेरे जीवन के कुछक्षण जो ईश्वर ने दिये ओर बढ़ गये है मैं अन्दर ही अन्दर मंत्र मुग्ध होकर इन क्षणों  के साथ जीने लगती हूँ!
             इन्ही विगत स्मृतियों में मेरे वो पल होते हैं जहाँ मेरा बचपन और यौवन अपने साथियों के साथ व्यतीत हुआ जो अब तक स्मृति बन कर मेरे ह्रदय के अंदर चिरकाल तकस्थाई हो गये।


           इन्ही स्मृतियों को एकान्त के क्षणों  मेँ याद करके एक सुखद स्पर्श का अनुभव होने लगता है !तब लगने लगता है जीवन के इन क्षणों  को याद करके मैं फिर से उन पलों में जी रही हूँ !आज फिर सायंकाल की पूर्वा हवा मेरे शरीर को स्पर्श करती हुई निकल गई जिसने उत्तरांचल की संवेदनाओ को जगा दिया ,मुझे याद आने लगा अपना पहाड़ अपना बचपन की समस्त क्रिया _कलाप !

           मुझे बचपन से ही प्रकृति से बहुत लगाव है। इसकी सुंदरता सदैव मुझे अपनी ओर आकृष्ट करती है ,वैसे मुझे हर सुंदर वस्तु चाहे वो वस्तु हो या व्यक्ति विशेष अपनी ओर खीँच लेती है फिर ईश्वर ने मुझे जन्म ऐसी जगह दिया जहाँ चारों ओर प्रकृति की सुंदरता बिखरी थी !मेरा बचपन का कुछ समय जो मुझे याद है लोहाघाट में बीता जो अब पिथौरागढ़ जिले में आता है !




लोहाघाट _जहाँ चारों ओर देवदार ,चीड़ ,पराश के फूलों के वृक्ष  हैजंगली फल काफल ,हिसालू ,कीलमोडे की झाड़ियाँ जगह  जगह पर दर्शनीय तो  है !लाल पीले बैगनी रंग के छोटे _छोटे फल जिस
लिए हम लालायित हो जाते थे और आपस में झगड़ते थे ,कैसे स्वच्छंद नीले आकाश के नीचे दीन _दुनियाँ से दूर हर एक की अपनी अलग दिनचर्या चलती रहती थी ,लोहाघाट से कुछ दूर मायावती आश्रम (अस्पताल )है !तब अक्सर हम लोग घूमने जाया करते थे !मायावती अस्पताल की माया अनोखी थी ,सभी डाक्टर गेरुवे रंग के वस्त्र पहने हुए ,मरीजों के लिए पुस्तकालय ,खाने का इंतजाम आदि सुविधा शहर से दूर शान्त वातावरण कोई आवाज नहीँ !मायावती आश्रम के अंदर ऐसा लगता कि मानो पद चाप की आवाज किसी मरीज को डिस्टर्ब न कर दें वहॉँ के डाक्टरों और पर्यावरण को देखकर ऐसा लगता हे कि बाल्मिकी रामायण के किसी आश्रम में पहुंच गये हों सब यंत्र चलित बिना बोले कार्य सुचारू रूप से देखते हुए लगता था कि लोग इतने संयमी भी होतेहै !प्रकृति की छटा ने इस आश्रम की सुंदरता को ओर दुगना कर दिया है     स्कूल के दिन कितने अच्छे व चिरस्मणीय होते न कोई डर न चिन्ता तब माहौल भी इतना खराब नही था 'वैसे भी पहाड़ के लोग सीधे _साधे किसी तरह की चालबाजी तो उनके रुधिर में घुली ही नहीँ होती है !ऐसे ही एक दिन हम वाणासुर का किला देखने निकल गये 

वाणासुर का किला_लोहाघाट शहर से कुछ दूर चोटी पर किला बसा हुवा है ,हमने सोचा इस चोटी पर क्या होगा जब चढ़ाई पार करके पहुँचे तो चोटी की लम्बाई _चौड़ाई देखते रह गये चारों ओर दीवारें और उस समय युद्ध के जोभी साधन होते थे उनके लिए जगह बनी थी किले में एक सुरगं भी थी ,25 सीढ़ियाँ नीचे हम भी उतरे उसके बाद सुरगं बंद कर दी थी कहते है यहाँ से वाणासुर की रानियाँ चम्पावत जाती थी !एक समय था जब चम्पावत चन्द्र राजाओं की राजधानी थी !
                                    सबसे अनोखी बात मुझे लगी की अंग्रेजों ने भी भारत के कोने _कोने को छाना था ,उन्होंने भारत की सुंदर से सुंदर जगह नहीँ छोड़ी चाहे वहाँ पहुँचने में कितनी परेशानियाँ क्यों न उठानी पड़ीहो '
                       पर्वतीय धरती जितनी सुंदर है उतनी कठोर और कठिन है दुर्गम रास्ते जिसमें चलकर इस कठोरता से टकराते हुए पर्वतीय मनुष्य मजबूत होकर संघर्षो से लड़ना सीखते है ,ऐसी जगह ने भी अंग्रेजो को अपनी ओर आकृष्ट कर दिया !

एबट माउन्ट_लोहाघाट से दूर एक जगह है जो एक अंग्रेज के नाम से प्रसिद्ध है ;अब वहाँ जाने के लिए काफी अच्छे रास्ते हो गये है पर जब अंग्रेज वहॉँ जाकर बसे होंगे तब रास्ते काफी कठिन होंगे उस समय अंग्रेजो ने एबट माउन्ट पर इतने सुंदर बंगले कैसे बनवाये होगे ?बंगले बहुत सुंदर जहाँ पर चारों ओर फल फूलों के वृछ है ये जगह अब पिकनिक स्पॉट बन गई है ,कहते है गर्मियाँ व्यतीत करने के लिए अंग्रेज पहाड़ों पर आजाते थे 'जब उदय होते सूर्य का प्रकाश और अस्त होते सूर्य की लालिमा इस जगह को ओर भी सुंदर बना देता है !ऐसी निश्चल प्रकृति मेंपहुँच कर प्रत्येक व्यक्ति कुछ समय के लिए संसार के समस्त सुखों को भूल कर इसमें विचरण करते हुए स्वर्गलोक  का आनन्द प्राप्त कर सकता है ' पर इस सौन्दर्यता को छोड़ कर आजिविका हेतु पहाड़ के लोग मैदानी भागों में बसने लगेहै ''


                                                                    अल्मोड़ा                                 अल्मोड़ा जिसे बुद्धिजीवी वर्ग का स्थान कहा गया है ,      यह नगरी कलाकारों से भरी पड़ी है इसकी प्राकृतिक सौन्दर्यता अलग है !यहाँ की बुद्धिमता के लिए यह प्रचलित है कि अगर अल्मोड़े के किसी भी घर की छत पर पत्थर फेँका जाय आवाज बी.ए ;एम ,ए की आती हैअर्थात हर घर में ग्रेजुएट व पोस्ट ग्रेजुवेट तो है ही। मेरी पूरी 
education अल्मोड़ा से है। मेरे विचार से life के सबसे अच्छे दिन college students के होते है science students होने की वजह से insects ,flowers collection के लिए हवालबाग चितई ,कसार देवी ,डोलीडाना आदि स्थानों में निकल जाते थे। प्राकृतिक सौन्दर्यता के लिए कौसानी बहुत सुंदर जगह है। 

    कौसानी प्रकृतिप्रेमी ,सुमित्रा नन्दन पंत जी का जन्म भी कुमाऊँ अंचल के कौसानी में हुआ था। कौसानी को भारत का स्विजरलैंड भी कहा जाता है इसकी सुंदरता अनोखी है। हिमालय पर्वत की श्रंखला बहुत मन मोहक दीखती है बर्फ से ढ़की इन चोटियोंको  उदय होता प्रकाश सुनहरे रंग से रंगकर इसकी सुंदरता दुगना कर देता है। जब सूर्य अस्त होता है तो इसका नजारा कुछ ओर ही होता है मानो सजी सजीली दुल्हन लाल रंग की चुनरी ओढे लाज भरी पलकों की कोरों से इतराती _इतराती जारही है। सैलानी लोग तो संध्या काल की सुंदरता से इतने मुग्ध हो जाते है कि ताली बजा बजाकर अपने अंदर के आनंद का इजहार करते है। प्रकृति की सुंदरता अनुपम है ही और कुमाऊँ की भूमि को देव _भूमि भी कहा जाता है। 

जागेश्वर अल्मोड़ा शहर से 25 _30 किलोमीटर की दूरी पर जागेश्वर मंदिर है। चारों ओर देवदारों के वृछों से ढका शिव का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। मंदिर के मध्य प्रांगण में एक बड़ा मंदिर है जिसके अंदर प्रतिमाएं है। इस मंदिर के चारों ओर छोटे _छोटे कई मंदिर है जिनमें शेव लिंग स्थापित है। इन मंदिरो पर बनी कला _कृतियाँ प्राचीन काल के इतिहास को दोहराती है। एक बार हम लोगजागेश्वर आये सर्दी का मौसम था ,अचानक बर्फ गिरने लगी। सफेद कपास से फूल सी बर्फ ने चीड़ और देवदार के वृछों को भिन्न _भिन्न आकृतियोंमें ढक लिया था। चारों ओर प्रकृति के हरे पन ने सफेद चादर का रूप लेलिया। ऐसा लगने लगा चारों ओर चांदी बिखरी हो या परीलोक रहस्यमय संसार हो। 
                                     कुमाऊँ की इस सुंदरता ने गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर और विवेकानन्द उन्हें भी अपनी ओर आकृष्ट कर लिया था। कहा जाता है कि गुरु रविन्द्रनाथ ठाकुर अक्सर गर्मियों में अल्मोड़ा आते थे और कंकर कोठी (जहाँ पर अब S P का ऑफिस )में रुका करते थे यहाँ से हिमालय रेंज का अवलोकन करके प्रकृति की इस सुंदरता को अपनी में बाँधते थे। 
                                  अल्मोड़ा के कलाकारों ने तो कुमाऊँ की सुंदरता अपनी तूलिका व रंगो से कैनवश पर निखारा है। कुछ कलाकारों के साथ जो वक्त मेने बिताया वो मैं भूल नही सकती ,
                                  इफ़तखार मोहम्द साहब ने तो हिमालय और कुमाऊँ के चित्रण का समावेश अपनी पेन्टिग में बहुत सुंदर तरीक़े से किया है। अल्मोड़ा ऑफिसर कल्ब में इनकी कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगी थी तब मुझे देखने का मौका मिला था। तब में बी ,एस सी में पढ़ती थी। लेकिन कैंसर की थी ने एक बड़े कलाकार को उम्र से पहले ही छीन लिया। कुछ कलाकार अख्तर भारती ,नवीन बंजारा ,सलीम आदि अभी भी कुमाऊँसे जुड़े है और अपनी कलाकृतियों के दावरा यहॉँ की प्राकृतिक सौन्दर्यता को बांधे है। 
                             `लोक नृत्य ,नाटक में श्री ब्रजेन्द्र लाल शाह जी का काफी योगदान रहा बहुत समय तक ये नैनीताल लोक नृत्य से जुड़े हुए थे तब उन्होंने भस्मासुर नाटिका प्रस्तुत की थी बाद में लखनऊ ड्रामाडिविजन के डायरेक्टर होकर अपने कार्य से मुक्त हुए थे !गोलू देवता (चितई )पर एकपत्रिका लिखी थी उसके बाद इनका देहान्त हो गया लेकिन अपने नाटक लोक नृत्य से वो हमारे बीच अब भी हे। अल्मोड़ा के विषय में ये बहुत सूछ्म रूप में है 
  कटारमल_अल्मोड़ा शहर से कुछ दूर हवालबाग व रानीखेत के बीच में एक छोटा गाँव है जो कटारमल के नाम से जाना जाता है। जब में एम ,एस सी ,में पढ़ती थी तब हम लोग यहाँ गये। यहाँ पर सूर्य मंदिर है।  मंदिर ऊँचाई पर है नीचे गाँव बसा है मेरे विचार से भारत में एक सूर्य मंदिर कोणार्क में है तो दूसरा कटारमल में है। मंदिर का एक _एक पत्थर विभिन्न प्रकार की कलाकृतियों से चित्रित है। मंदिर से गाँव का नजारा बहुत ही सुन्दर लगता है। गाँव की औरतें और युवतियाँ जब सर पर घास की गठरी या पानी का घड़ा रख कर टेढी _मेढ़ी पगडण्डी पर चलते उनकी कमर इधर _उधर लचकती हुई ऐसी लगती है की कितनी मस्त चाल से चली जा रही है। सर का बोझ भी बोझ नहीं लगता पहाड़ी इलाकों में अक्सर सभी लोग गोरे दिखाई देते है (साफ रंग )बगर श्रंगार किये हुए हर पहाड़ी बाला मुझे तो बिहारी की नायिका सी लगती हे। कभी _कभार हम लोग रानीखेत घूमने चले जाते थे। 
 रानीखेत _कुमाऊँ में जितने शहर और गावँ है रानीखेत की प्राकृतिक छटा सबसे अलग है। सृष्टिकर्ता ने कुछ जगहों को बड़ी तल्लीनता से संवरा है उनमें से रानीखेत एक है। रानीखेत के हर कोने से 300 मीटर तक हिमालय रेंज का नजारअदितीय दिखाई देता है नन्दादेवी की चोटीबहुत  स्पष्ट और सुंदर दिखाई देती है प्रात:सूरज की किरणें इस पर पड़ती हैं तो हिमालय रेंज ऐसे चमकता है कि कवि कल्पना सार्थक हो जाती है हिमालय भारत का मुकुट है। 
                       इसी सुंन्दरता को देखने के लीए सैलानी लोग बहुत दूर _दूर से आते है। इस सुन्दरता में मुग्ध हो जाते है कुछ भी बनावटी नहीं सब ईश्वर की देन है तभी तो कवि का मन कह उठता है "मन मोहिनी प्रकृति की जो गोद में बसा वह देश कौनसा "?शहर से कुछ दूरी पर गोल्फ़ कोर्स है एशिया का यह पहला गोल्फ कोर्स हे जो इतनी उँचाई पर है और चारों ओर से चीड़ देवदार के वृछों से घिरा दूर तक नजर आता हरी भरी घास का मैदान जो आँखों को शांति मन को सुखद स्पर्श का अनुभव देता है। ऐसी जगह पर आकर कुछ छणों के लेया मन अनोखे आनंद से तृप्त हो हो जाता है रानीखेत में झुलादेवी ,चौबटिया गार्डन भी देखने लायक है। कुमाऊँ के शहर एक से लगे हुए पास _पास है इन्ही में नैनीताल एक अनुपम शहर है। 
   नैनीताल  यह शहर चारों ओर से चोटियों से घिरा हुआ है शहर के बीच में एक बड़ा लेक (तालाब )है नावसे नौकाविहार का आनंद लेते हुए तल्लीताल से मल्लीताल तक पहुंचा जाता है। नैनीताल शहर से दूर गवरमेंट हाउस ,हनुमान गढ़ी ,चाइना पीक ,टिपनटोप ,ऑव्जरवेटरी आदि देखने लायक है यहाँ पर नछत्र ,तारामण्डल का अध्य्यन किया जाता है हम लोगों ने शनि ग्रह देखा दूरबीन से ग्रह देखने के लेया सबसे पहले गुंबदनुमा छत हटती फिर ग्रह को फोकस किया जाता है नीले आकाश में तारामण्डल आकाश गंगा दिखाई देती हैब्रह्माण्ड से संबन्धित पुस्तकालय भी है। .... _                  
भीमताल यह शहर तो है ही तालाबों (लेकस )का शहर यहाँ पर सात ताल.भीमताल ,नो कुचीया ताल ,नल दमयंती ताल ,हरीश ताल आदि है ,नो कुचीया ताल बहुत बड़ा है इस ताल के बीच में चले जाने पर भी इसके नो कोने एक साथ नहीँ दिखाई देतयह शहर भी अपनी प्राकृतिक सौंदर्यता के लिए अलौकिक है 
         उपरोक्त शहर कुमाँऊ के कुछ शहरों में से हें उत्तांचल का एक छोर कुमाऊं और दूसरा गढ़वाल है। दोनों अपनी प्राकृतिक सुंदरता और देवभूमि के कारण प्रसिद्ध है। आज भी मेरा मन हरी भरी वदियों ,बर्फ से भरी चोटियों ,चीड़ देवदार के घने जंगलो के लिए तरसता है। 

                                                   मन अब भी ,मचल उठता है
                                                   प्रकृति की हरी भरी
                                                    गोद के लिए तरसता है।
                                                    दूर चीड़ बाँज ,काफल पुरांश
                                                   हिम खण्डों से ,बहती मन्द पवन
                                                      सुनहरा प्रभात निनाद करते प्रपात।
                                                    नीला स्वच्छ आकाश
                                                   पूर्णिमा का चाँद ,शरद रितु की चाँदनी
                                                     मेरा मन तलाशता है तलाशता है
                                                     तरसता है।    

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