मेघदूत
मेघदूत तुम
पहाड़ों को छूते
आकाश में विचरते
विभिन्न रूप रखते
धीरे -धीरे् खिसकते
न जाने कहाँ चले जाते
हे मेघदूत
ग्रीष्म का मार्तड [सूरज ]
धरा को तपाता
धरती चर व्याकुल होते
बाट निहारते
तुम गरजते- गरजते
न बरसते
कहां चले जाते
हे जलद
जल कण ढोते- ढोते
तुम थकते नहीं
पथिक राहगीर
तुम्हें निहारते
बरसा दो मधुरस
बुझा दो प्यास धरा की
हे मेघदूत
तुम क्यों निष्ठुर बन जाते
जहां नहीं बरसना
वहां बरस जाते
धरा पर
जल का प्रलय मचा देते
धधकती धरा पर
बूंद नहीं बरसाते
कैसा तुम्हारा रूप
हे मेघदूत
क्यों नील गगन से
आँख मिचौली करते
बिना तुम्हारे
नहीं अस्तित्व धरा का
प्रकृति की हरियाली
हर जीवन का
जीवन तुमसे
धरा नीरद वारिद ,नील
नीर बरसा दो
धरा की प्यास
बुझा दो
हे मेघदूत
जब मेघ घमण्ड
गर्जहीं घन घोरा
पशु मृग पछी
नाचत मोरा
हे मेघदूत
अपना मधुरस
मरु भूमि में
बरसा दो
रेतीले होठों की
प्यास बुझा दो
घन घटाओं को फैला दो
मधुरस बरसा दो
बरसा दो।
