भय का कोहरा
भय का कोहरा
छँटता नजर नहीं आता
हर शहर गाँव
गलियों पर अँधियारा
कब कौन
कहाँ से आ जाए
मासूम कलियों
को नोच ले
अब शहर की भीड़
में भी डर लगता है
दन दनाती गोलियाँ '
किधर से आ जाए
चीख पुकार
मातम में बदल जाए
हर चेहरे पर
दहशत है
बाहर से खुशनुमा
अंदर से डर
न जाने कब
भारी बूटों के दानव।
मानवता को
रौंदते चले जाएं
हा हा कार
चीख़ पुकार
फिर
चिता जलने के बाद
मुर्दा घाट की तरह
सब शान्त
तब सरकार
हरकत मै आयेगी
गली मोहल्ले चौराहे पर
चौकसी बढ़ा दी जायेगी
जवान बंदूकें लिए
इधर उधर घूमते
नजर आयेंगे
घायलों को अस्पताल
लाशों को जला दिया जायेगा
क्या राख की चिंगारी से
कोई अंगारा पैदा होगा
जो कलियों को मसलने से
मानवता को लुटने से
रोके।
कौन महामानव
उत्तर देगा
मेरे मन की
पीड़ा हर लेगा
