शनिवार, अगस्त 23, 2014

लोकतन्त्र की आवाज



भा र त  एक सम्पूर्ण प्रभुता -सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य  है
सभी  लोगो का कर्तव्य  बनता हे कि सभी लोगोँ में समानता और समान भातृत्व की भावना का निर्माण  करे
जो सभी भेद भावों से परे हो और हर व्यकितकी  गरिमा विश्वास धर्म और राष्ट्र   की एकता और  अखंडता     को सुनिश्चित करने वाली बन्धुता को बढ़ाना चाहिए न कि हिन्दुत्व की भावना को '

बुधवार, अगस्त 20, 2014

नियति की पुकार

 ,

हम इस धरती के किरायेदार है न कि मालिक अंतः ;हमें इसका प्रयोग एक समझदार किरायेदार की तरह करना चाहिए अन्यथा इसके दु ष्परिणाम ही भुगतने होंगे '
अवनि से अम्बर तक ,बिखरते गये
  सागर से हिमालय तक ,फैलते गये
  विकास की चरम सीमा लाँघते गये
   धरती गरम होती गई ,
   ग्लेशियर ,हिमखण्ड ,पिघलते गये ,
प्रकृति की गोद में ,उधेड़बुन करते गये ,
 हर जगह आशियाना ,बनाते  गये
मेरे अस्तित्व को नकारा
   कई बार कराया आभास ,
   तुम न आये रास
    कई तांडव नृत्य दिखाये
  भूकम्प के क्रंदन का
  सुनामी की उद्धत लहरों  का 
 जल के असीम प्रवाह का।
आँधी तूफान का                 
मेरे क्रंदन को समझ न पाये। 
आक्रोश बढ़ाते चले गये
देखा तुमने ?
महाप्रलय जल का
शिलाखंडों का बहना
धर्म की आस्था का बहजाना
बहुत कुछ पाने की लालसा में
सब कुछ खोजना

                          
                                                              

रविवार, अगस्त 17, 2014

एक सोच

15 अगस्त को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने लाल किले की प्राचीर से जो जोश भरा भाषण दिया जिसने कर हिन्दुस्तान के हर नागरिक को कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक हिला दि  या सबकी  अंतरात्मा को झझोड़   कर रख दिया अगर श्री मोदी जी की तरह हमारे सांसद भी सोचने लगे और अपना तन मन धन देश के कामो में लगादे तो कुछ सालों बाद भारत सोने की तरह चमकेगा दुनिया का प्रत्येक राष्ट्र हिन्दुस्तान की ओर देखने लगेगा तब भारत अपनी डायमंड जुबली मनायेगा '        
 '

शनिवार, अगस्त 16, 2014

वयर्थ की बरबादी

मुझे  लगता हें कि जब  भी कोई  समारोह  हो चाहे वो पार्टी का हो या राजनीति उसमे जो भी सम्मानित व्यक्ति आते है। उनको  सम्मानित करने के लिए अच्छे शब्दों का ही प्रयोग करना काफी हैं। ना की फूल मालाओं से
क्यूकि फूल और मालाये तो मेरे विचार से भगवान और पुजा स्थल पर ही चढ़ाई जाती है या फिर अर्थी पर
इनसे लोगो को समान्नित करने के बाद ये, या तो बरबाद हो जाती है या फिर कुचल दी जाती है।
क्या ये पैसों की बरबादी नहीं है  ? 
            खासकर हमारे नेताओं को  इस बात पर विषेश ध्यान देना चाहिए। इस प्रकार का दिखावा किस बात का ? जब जनता ने तुम्हे इतना सम्मान दे कर संसद तक पोहचाह दिया। फिर क्यों एक दूसरे को फूल माला पहनाकर, समय का , धन का , और वस्तुओ को बरबाद कर रहे हो । क्या अब महंगाई नहीं है ? महंगाई  को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार का दिखावा आवश्यक नहीं है. 
  मेरे विचार से सम्मान के दो शब्द ही काफी होते  हैं।